
पुरुषोत्तम मास व्रत कथा
प्राचीन समय की बात है। एक नगर में एक गरीब ब्राह्मण और उसकी पत्नी रहते थे। वे भगवान विष्णु के परम भक्त थे, लेकिन अत्यंत गरीबी में जीवन व्यतीत कर रहे थे। ब्राह्मण की पत्नी प्रतिदिन भगवान से प्रार्थना करती कि उनके घर की दरिद्रता दूर हो जाए।
एक दिन नगर में एक महात्मा आए। ब्राह्मण दंपति ने श्रद्धा से उनकी सेवा की। प्रसन्न होकर महात्मा ने कहा—
“हे पुत्र! जब पुरुषोत्तम मास आए, तब पूरे महीने भगवान श्रीहरि विष्णु का व्रत, पूजा, कथा और दान करना। इससे तुम्हारे सारे दुःख दूर हो जाएंगे।”
कुछ समय बाद पुरुषोत्तम मास आया। ब्राह्मण दंपति ने नियमपूर्वक व्रत रखा। प्रतिदिन सुबह स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा की, दीप जलाया, तुलसी अर्पित की और कथा सुनी। वे गरीब थे, फिर भी अपनी क्षमता अनुसार दान-पुण्य करते रहे।
उनकी भक्ति देखकर भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न हुए। एक रात भगवान ने ब्राह्मण के स्वप्न में दर्शन दिए और कहा—
“हे भक्त! तुम्हारी श्रद्धा और पुरुषोत्तम मास के व्रत से मैं प्रसन्न हूँ। अब तुम्हारे जीवन के सारे कष्ट समाप्त होंगे।”
अगले ही दिन से उनके घर में सुख-समृद्धि आने लगी। धन, अन्न और सम्मान सब बढ़ने लगा। पूरे नगर में उनकी भक्ति की चर्चा होने लगी।
तभी से मान्यता है कि जो भी श्रद्धा और नियम से पुरुषोत्तम मास का व्रत, कथा और पूजा करता है, भगवान विष्णु उसकी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं और जीवन में सुख-शांति प्रदान करते हैं।
पुरुषोत्तम मास में क्या करें?

- भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की पूजा करें
- गीता और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें
- तुलसी पूजा करें
- गरीबों को दान दें
- ब्रह्मचर्य और सात्विक भोजन का पालन करें
- कथा और भजन सुनें
क्या नहीं करना चाहिए?
- मांस-मदिरा का सेवन
- झूठ बोलना और क्रोध करना
- किसी का अपमान करना
- तामसिक भोजन खाना
पुरुषोत्तम मास का महत्व
पुरुषोत्तम मास को भगवान विष्णु का प्रिय महीना माना जाता है। यह लगभग हर 3 साल में आता है। इस मास में किए गए जप, तप, दान और पूजा का फल कई गुना अधिक मिलता है। धार्मिक मान्यता है कि इस महीने में सच्चे मन से की गई भक्ति व्यक्ति के पापों को नष्ट कर देती है।
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